महाश्वेता की प्रतीक्षा में

>> 19 January 2010

स मकर संक्रान्ति को महाश्वेता देवी 84 की हो गईं। लेकिन उनकी सक्रियता और कार्य कलाप देखते हुए वे कहीं से भी वृद्ध नहीं लगतीं। अब भी उनमें वही आग है जो पहले दिखाई पड़ती थी। अब भी वे साधारण लोगों से वैसे ही मिलती-जुलती हैं जैसे नया परिचय उनके लिए कोई भार न हो। वे शहर में रहती हैं, पर उनका हृदय उन बसे हुए जंगलों और उजड़ते हुए गांवों में मंडराता रहता है जहां भारत माता के अभागे सपूत रहते हैं। चूंकि उन्हें विचारधारा से अधिक सार्थक कर्म में विश्वास है, इसलिए वे इस बात की परवाह नहीं करतीं कि कोई उन्हें माआ॓वादी कहता है या राजद्रोही। दरअसल, जब व्यक्तित्व बड़ा हो, तब आरोपों के तीर उस तक पहुंचने के पहले ही कुंद हो जाते हैं। महाश्वेता देवी पर कीचड़ उछालने वाला सबसे पहले खुद ही बदरंग लगने लगता है, क्योंकि यथार्थ का सूर्य घने से घने बादलों के बीच भी मुस्कुराता रहता है। पता नहीं, महाश्वेता देवी का साहित्य कितने दिन टिकेगा या बांग्ला साहित्य के इतिहास में उसे कितनी जगह दी जाएगी। यह संदेह इसलिए पैदा होता है कि साहित्य उनके लिए कला की साधना की वस्तु नहीं है। वे महान साहित्यकार नहीं बनना चाहतीं, उनका लक्ष्य लोगों का लेखक बनना है। कौन कह सकता है कि इस समय वे भारत की सबसे बड़ी जनपक्षीय लेखक नहीं हैं? बांग्ला और दूसरी भाषाओं में होंगे बड़े-बड़े लेखक, पर महाश्वेता देवी सिर्फ लेखक नहीं हैं। उनका समग्र लेखन उनके सामाजिक कर्म का परिपूरक है। महात्मा गांधी ने एक भी शब्द ऐसा नहीं लिखा जो सिर्फ मनोरंजन के लिए या उनकी गघ सामर्थ्य को प्रगट करनेवाला हो। उनका एक मिशन था और वे जब भी कलम उठाते थे, इस मिशन को पूरा करने के लिए ही उठाते थे। महाश्वेता देवी भी ऐसा ही करती हैं।...पूरा पढ़ें
साभार : rashtriyasahara.com, 17 jan 2010

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नए साल की शुभकामनाएं!

>> 04 January 2010

नए साल की शुभकामनाएं!
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं !

जांते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएं !

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएं!...पूरा पढ़ें

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

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अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं...

>> 20 November 2009

महेश अश्क की दो गज़लें
     
अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं
हम जितना होते हैं अक्सर, उससे भी घट जाते हैं


तुम्हें तो अपनी धुन रहती है, सफ़र-सफ़र, मंज़िल-मंज़िल
हम रस्ते के पेड़ हैं लेकिन, धूल में हम अट जाते हैं


लोगों की पहचान तो आख़िर, लोगों से ही होती है
कहाँ किसी के साथ किसी के बाज़ू-चौखट जाते हैं


हम में क्या-क्या पठार हैं, परबत हैं और खाई है
मगर अचानक होता है कुछ और यह सब घट जाते हैं


अपने-अपने हथियारों की दिशा तो कर ली जाए ठीक
वरना वार कहीं होता है, लोग कहीं कट जाते हैं
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अच्छाई अन्यत्र के लिए ही है क्या!

>> 19 November 2009

-जनार्दन
दीपावली के दूसरे दिन सबरे टहलने में सभी मिले, आमतौर पर जो मिलते हैं और बात-व्यवहार की अपनी-अपनी शैली-संवेदना के नाते इस काल की सामूहिकता के एक तरह से अपरिहार्य हिस्से हैं। इनमें से अगर कोई न मिले तो, समूह उसके बिना हुटुकता है, उसकी अनुपस्थित पर मौज-मस्ती भरी कुछ कही-अनकही फबतियाँ कसकर मुक्त हँसी की फुलझड़ियाँ छोड़ता है; और उस दिन के मार्निंग वाक् के कुछ बेमजा़ रह जाने से लस्त-पस्त घर लौटता है शेष दिनचर्या के लिए।...To read more click heading

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...राजनीति की गोट हो गए यारो अपने रामलला

>> 11 November 2009

विभांशु दिव्याल की एक गजल

राजनीति की गोट हो गए यारो अपने रामलला
सही समझ पर चोट हो गए यारो अपने रामलला

रीति-नीति शुभ ज्ञान कर्म के नायक थे, उन्नायक थे
अब तो लूट खसोट हो गए यारो अपने रामलला

सबके सब धंधे में उतरे स्वामी साधु-संत, महंत
दाम कमाऊ नोट हो गए यारो अपने रामलला

दया नहीं, देवत्व नहीं जिनकी कुटिल कुचालों में
उनके चलते ओट हो गए यारो अपने रामलाला...click heading

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अश्वमेध : ...वे काट डालेंगे तुम्हारा प्रचंड मस्तक

पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक कविता

तुम बहुत सरपट दौड़े हो
थोड़ा ठहर जाओ
न, तुम नहीं थके, जानता हूं
लेकिन तुम्हारी दौड़ ने बहुतों को कुचला है
ठहर जाओ
तुम्हारी रगों में फड़कती बिजली
तुम पर नहीं, दूसरों पर गिरती है
कोई वल्गा नहीं तुम्हारे मुंह में
फिर भी तुम्हारी पीठ खाली नहीं
वहां सवाल है पताका
जिसकी फहराती नोक तुम्हें नहीं
दूसरों को चुभती
है...to read click heading

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किस कदर वाचाल निकलीं सुर्खियां अखबार की

>> 10 November 2009

माधव कौशिक की दो गजलें

किस कदर वाचाल निकलीं सुर्खियां अखबार की
खून से भी लाल निकलीं सुर्खियां अखबार की

लादकर कांधे पे अपने, रोज विक्रम सत्य का
झूठ का बेताल निकलीं सुर्खियां अखबार की

उम्र भर आतंक की, हिंसा की या फिर भूख की
आग से बेहाल निकलीं सुर्खियां अखबार की

कौन किसके पक्ष में देगा गवाही रात को
बाल की भी खाल निकलीं सुर्खियां अखबार की...Read full CLICK HEADING.

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पढ़िए गीता, बनिए सीता...फिर इन सब में लगा पलीता

>> 09 November 2009

पढ़िए गीता, बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइए
होंय कंटीली, आंखें गीली
लड़की सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए

-रघुवीर सहाय, ‘सीढ़ियों पर धूप में’ से read more...click heading

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किल्ला-ठोंक ‘वर्गवाद’ और अद्वैती ‘वर्णवाद’ के कुछ इधर-उधर भी

>> 04 November 2009

-जनार्दन
प्रिय बंधु दिनेश कुशवाह की कविता- ‘अपना घर फूँकने का विकल्प आज भी खुला है’ पढ़ने के दौरान कुछ अपनी भी कहने की विवशता बनती गई, जिसे दिनेश जी की काव्य-शक्ति के खाते में कर देना ही ठीक है। बातें और संवेदनाएँ तो तरह-तरह से आती-जाती रहती हैं, लेकिन बेध देने वाला धरातल सभी छू नहीं पातीं। बात ही लगी थी कि अपने कबीरदास जी इस दशा में आ गए थे-‘सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक / लागत ही भैं मिलि गया, पड्या कलेजे छेक।’कविता में संवेदना के भीतर कथ्य का तंतु सूक्ष्म रूप में ही क्रियााशील रहता है, जिसके चलते रहस्य का एक वातावरण सृजित होता है। इसके अभाव में काव्य-आनन्द नहीं मिलता। पाठक अपने-अपने काव्य-संस्कार, शिक्षा व संवेदना-शक्ति के आलोक में काव्य के सहारे ही कवि तक पहुँचते हैं।...CLICK HEADING

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बाजार ने मीडिया को पालतू बना लिया : जगदीश लाल

>> 03 November 2009

यह जुमला आम हो गया है कि मीडिया वाले जो चाहें ‘लिख दें, छाप दें, दिखा दें’। ‘लिख दें, छाप दें,’ से उनका आषय प्रिंट मीडिया से होता है जबकि ‘दिखा दें’ से उनका आषय इलेक्ट्रनिक मीडिया से है। मीडिया से समाज की यह उलाहना मेरी नजर में आधा सच, आधा झूठ है। मेरी एक और राय है और षायद यह आपकी तथा दूसरे प्रबुद्ध जनों की भी होगी कि मीडिया के सामने विष्वसनीयता का एक बड़ा संकट आज आन पड़ा है। यह संकट कहां से खड़ा हुआ और इस रोग की दवा क्या है इसको खोजना जरूरी है....click on heading.

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