नए साल की शुभकामनाएं!
>> 04 January 2010
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
जांते के गीतों को बैलों की चाल को
इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं...
>> 20 November 2009
हम जितना होते हैं अक्सर, उससे भी घट जाते हैं
अच्छाई अन्यत्र के लिए ही है क्या!
>> 19 November 2009
...राजनीति की गोट हो गए यारो अपने रामलला
>> 11 November 2009
राजनीति की गोट हो गए यारो अपने रामलला
सही समझ पर चोट हो गए यारो अपने रामलला
रीति-नीति शुभ ज्ञान कर्म के नायक थे, उन्नायक थे
अब तो लूट खसोट हो गए यारो अपने रामलला
सबके सब धंधे में उतरे स्वामी साधु-संत, महंत
दाम कमाऊ नोट हो गए यारो अपने रामलला
दया नहीं, देवत्व नहीं जिनकी कुटिल कुचालों में
उनके चलते ओट हो गए यारो अपने रामलाला...click heading
अश्वमेध : ...वे काट डालेंगे तुम्हारा प्रचंड मस्तक
तुम बहुत सरपट दौड़े हो
थोड़ा ठहर जाओ
न, तुम नहीं थके, जानता हूं
लेकिन तुम्हारी दौड़ ने बहुतों को कुचला है
ठहर जाओ
तुम्हारी रगों में फड़कती बिजली
तुम पर नहीं, दूसरों पर गिरती है
कोई वल्गा नहीं तुम्हारे मुंह में
फिर भी तुम्हारी पीठ खाली नहीं
वहां सवाल है पताका
जिसकी फहराती नोक तुम्हें नहीं
दूसरों को चुभती है...to read click heading
किस कदर वाचाल निकलीं सुर्खियां अखबार की
>> 10 November 2009
माधव कौशिक की दो गजलें
किस कदर वाचाल निकलीं सुर्खियां अखबार की
खून से भी लाल निकलीं सुर्खियां अखबार की
लादकर कांधे पे अपने, रोज विक्रम सत्य का
झूठ का बेताल निकलीं सुर्खियां अखबार की
उम्र भर आतंक की, हिंसा की या फिर भूख की
आग से बेहाल निकलीं सुर्खियां अखबार की
कौन किसके पक्ष में देगा गवाही रात को
बाल की भी खाल निकलीं सुर्खियां अखबार की...Read full CLICK HEADING.
पढ़िए गीता, बनिए सीता...फिर इन सब में लगा पलीता
>> 09 November 2009
पढ़िए गीता, बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइए
होंय कंटीली, आंखें गीली
लड़की सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए
-रघुवीर सहाय, ‘सीढ़ियों पर धूप में’ से read more...click heading
किल्ला-ठोंक ‘वर्गवाद’ और अद्वैती ‘वर्णवाद’ के कुछ इधर-उधर भी
>> 04 November 2009
-जनार्दन
प्रिय बंधु दिनेश कुशवाह की कविता- ‘अपना घर फूँकने का विकल्प आज भी खुला है’ पढ़ने के दौरान कुछ अपनी भी कहने की विवशता बनती गई, जिसे दिनेश जी की काव्य-शक्ति के खाते में कर देना ही ठीक है। बातें और संवेदनाएँ तो तरह-तरह से आती-जाती रहती हैं, लेकिन बेध देने वाला धरातल सभी छू नहीं पातीं। बात ही लगी थी कि अपने कबीरदास जी इस दशा में आ गए थे-‘सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक / लागत ही भैं मिलि गया, पड्या कलेजे छेक।’कविता में संवेदना के भीतर कथ्य का तंतु सूक्ष्म रूप में ही क्रियााशील रहता है, जिसके चलते रहस्य का एक वातावरण सृजित होता है। इसके अभाव में काव्य-आनन्द नहीं मिलता। पाठक अपने-अपने काव्य-संस्कार, शिक्षा व संवेदना-शक्ति के आलोक में काव्य के सहारे ही कवि तक पहुँचते हैं।...CLICK HEADING
बाजार ने मीडिया को पालतू बना लिया : जगदीश लाल
>> 03 November 2009
यह जुमला आम हो गया है कि मीडिया वाले जो चाहें ‘लिख दें, छाप दें, दिखा दें’। ‘लिख दें, छाप दें,’ से उनका आषय प्रिंट मीडिया से होता है जबकि ‘दिखा दें’ से उनका आषय इलेक्ट्रनिक मीडिया से है। मीडिया से समाज की यह उलाहना मेरी नजर में आधा सच, आधा झूठ है। मेरी एक और राय है और षायद यह आपकी तथा दूसरे प्रबुद्ध जनों की भी होगी कि मीडिया के सामने विष्वसनीयता का एक बड़ा संकट आज आन पड़ा है। यह संकट कहां से खड़ा हुआ और इस रोग की दवा क्या है इसको खोजना जरूरी है....click on heading.






