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11 सितंबर 2014

विधवा ब्राह़मणी के गर्भ से पैदा हुई हिंदी

हिंदी की दशा पर स्‍यापा करने और उस पर एकाधिकार जताने का दिन फिर करीब है। हिंदी की रोटी खाने वाले जिस तरह और तरीके से इस स्‍यापे में शामिल होते हैं, और तरह जिस हिंदी की शुचिता बरकरार रखने के लिए चिंतातुर दिखते हैं उसे देखकर उनकी प्रतिकूलगामी मानसिकता का ही परिचय मिलता है। क्‍या यह मानसिकता हिंदू सवर्ण समाज की मानसिकता नहीं है, जो भाषा को भी अपनी जागीर समझता आया है।


कभी सोचता हूं कि आखिर सात सौ साल पहले कबीर को यह बताने की नौबत क्‍यों आन पडी थी कि ‘भाखा बहता नीर है’। निश्चित तौर पर कबीर ने भाषा की शुचिता का आग्रह पालने वाले हिंदू विद्वत समाज को यह संदेश दिया था। खुसरो और कबीर से होते हुए हिंदी ने आज जो स्‍वरूप और स्‍वभाव हासिल किया है,  उसे खत्‍म करने की कोशिश हिंदी दिवस पर कुछ शुद़धतावादी साहित्‍यकार-संपादक करते हैं।



संस्‍क़त के प्रभाव से छूटने में‍ हिंदी को सैकडों साल लगे। हजारों देसी-विदेसी शब्‍दों को खुद में समाहित करने की अपार क्षमता के साथ हिंदी का विस्‍तार होता रहा है (माफ कीजिएगा, यहां हिंदी समुदाय की जनसंख्‍यागत विशेषता और हिंदी पट़टी में हुए राजनीतिक आंदोलनों में नहीं जाना चाहता)। इस दौरान हिंदू मानसिकता का  सनातनी शुद़धतावादी आग्रह लगातार मौजूद है। आज यह इस रूप में मौजूद है कि अंग्रेजी के जो शब्‍द हिंदी में जगह बना चुके हैं, उनसे तो प्रेम कीजिए, लेकिन नए शब्‍दों के लिए दरवाजे बंद रखिए। यहां गौर फरमाने वाली बात है कि कबीर को इन्‍हीं लोगों को बताना पडा था कि भाषा बहता नीर है।



हिंदी दिवस पर यह स्‍यापा करने की जरूरत नहीं कि हिंदी अपना व्‍याकरण खो रही है या अंग्रेजी शब्‍दों की घुसपैठ बढती जा रही है। इस चिंता में जीने वाले या विदेशी शब्‍दों पर बैन लगाने की चाहत रखने वाले आखिर हिंदी में फेसबुक, व्‍हाट़सअप, टि़वटर, मेल, ट़वंटी-ट़वंटी, मोबाइल आदि-आदि शब्‍दों का क्‍या विकल्‍प तैयार करेंगे। हिंदी को उसकी गति से बहने दीजिए। हजारों ऐसे शब्‍द हिंदी की डिक्‍शनरी को रिच करने के लिए तैयार हैं, उनका स्‍वागत कीजिए, वरना हमारी हिंदी भी कबीर की तरह किसी विधवा ब्राह़मणी के गर्भ से पैदा हुई दिखेगी। वह कबीर जिसका तेज हरने के लिए कभी ऐसा किया गया था।




- सिद़धार्थ नीर

1 टिप्पणी:

Priyankar ने कहा…

'भाखा बहता नीर' इसलिए कि उस पर किसी एक वर्ग या समूह का एकाधिकार न हो, सबका अधिकार हो । 'भाषा बहता नीर' भाषा-सरिता में कचरा फेंकने और उसे कचरा-पात्र बना देने के लिए नहीं है ।

'प्यूरिटनिज़्म इन लेंगुएज इज़ अ यूटोपियन कॉन्सेप्ट' , इस लिए सहज रूप से आगत का भरभूख स्वागत होना चाहिए । वैसे भी शुद्धतावादी लाख कोशिश कर लें भाषा का स्वभाव ही ऐसा है कि वह जड़ और विशुद्ध नहीं रह सकती । भाषा-सुंदरी की शीलरक्षा-सेना के सिपाहियों की कवायद व्यर्थ है वैसे ही जैसे कि भाषाई समावेशन का चलताऊ किस्म का रेडीमेड फार्मूला पा चुके सिद्ध समावेशी-स्वयंसेवकों का मिलावटी उत्साह । भाषाई आदान-प्रदान दीर्घकालीन मामला है । उसके तात्कालिक हल नहीं हो सकते ।

गंगा-जमुनी भाषा का इस्तकबाल होना चाहिए पर भाषा धर्मशाला भी नहीं है जहां बिना किसी रोकटोक के किसी को भी मन-मर्जी घुसा दिया जाए । वरना 'इंजन की सीटी सूं म्हारो मन डोले' को म्हारा 'bum' डोले... होने से कोई नहीं रोक सकता । इसलिए मेलोड्रामैटिक होने और एकांगी सिद्धान्तप्रियता से कहीं ज्यादा जुरूरी है अपनी भाषा के प्रति आत्मीय अवधान, थोड़ी-बहुत सजगता और आम आदमी की सामूहिक स्मृति पर वाजिब भरोसा ।

नए शब्द आपको 'एनरिच' भी कर सकते हैं और अगर वे किसी एजेंडा के तहत जबरन ठेले जा रहे हैं तो रचे-पचे शब्दों को 'डिच' भी कर सकते हैं ।

भाषा की दुनिया सिद्धान्त से अधिक स्मृति, संवेदन और अभिव्यक्ति की विराट-व्यापक दुनिया है ।